Tuesday, January 14, 2014

पुष्प की अभिलाषा

चाह नहीं मैं सुरबाला के, 

गहनों में गूँथा जाऊँ। 

चाह नहीं, प्रेमी-माला में, 

बिंध प्यारी को ललचाऊँ। 

चाह नहीं, सम्राटों के शव, 

पर हे हरि, डाला जाऊँ। 

चाह नहीं, देवों के सिर पर, 

चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ। 

मुझे तोड़ लेना वनमाली, 

उस पथ पर देना तुम फेंक। 

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, 

जिस पर जावें वीर अनेक।

------- माखनलाल चतुर्वेदी 

No comments:

Post a Comment

पलायन की पीड़ा

पलायन की पीड़ा हिमालय   की   गोद   में   बसा , देव भूमि - उत्तराखण्ड । दूर से दिखते वो ऊँचे - ऊँचे पहाड़   देवदार की चादर ओढ़े...