पलायन की पीड़ा
हिमालय की गोद में बसा,
देव भूमि - उत्तराखण्ड ।
दूर से दिखते वो ऊँचे-ऊँचे पहाड़
देवदार की चादर ओढ़े
बहुत खूबसूरत से लगते है।
कुछ गाँव भी हैं वहाँ,
देवभूमि की ऐतिहासिकता के परिचायक।
गाँव में घर हैं, गलियाँ हैं,
कुछ ऊँचे-नीचे खेत भी हैं।
मगर बच्चों की खिलखिलाहट ?
युवाओं के ठहाके ?
या ज़िंदगी की अठखेलियाँ ?
कुछ शांत सी हैं ।
घर तो है,
कुछ नए, कुछ पुराने बने से ।
मगर खिड़कियों से झांकते,
या चौखट पर बैठे,
बुजुर्द दंपति की आँखों में,
अपने कल को लेकर अनेकों सवाल हैं।
बच्चे शायद स्कूल गए हैं,
पर कुछ महिलायें हैं
जो काम में व्यस्त हैं,
उस घर को सँभालने में
दीवार की उखड़ती पपड़ी को
बचाने में, संवारने में।
और घर के युवा, होनहार भविष्य,
हैं कोसों दूर, परदेस में।
कुछ रोज़ी रोटी कमाने,
कुछ और नया पढ़ने,
कुछ और बड़ा बनने,
उस महकती माटी से दूर,
ताज़ी हवा से दूर
देवदार की छाँव से दूर
कुछ आज की ख़ुशियों को,
चूल्हे में फूंक कर
कल के सपने ख़रीदने की उम्मीद में,
हैं घर से दूर।
- राजेश मीना ‘बुजेटा’