Sunday, July 2, 2023

तुम्हारा जाना......

 चलते - चलते रुक सा जाना,

बैठे - बैठे ही सो जाना,

तुम्हारा जाना, जैसे, 

महफ़िल में, तन्हा हो जाना ।


अंबर का काला हो जाना,

ज्वाला का ठंडा पड़ जाना,

तुम्हारा जाना, जैसे,

इंद्र धनुष के, रंग पिघलना।



शरबत का फीका रह जाना,

अंगूरों का सूखा जाना,

तुम्हारा जाना, जैसे,

मिश्री में, चीनी कम होना।


कलियों का यूँही मुरझाना,

बागों से तितली उड़ जाना,

तुम्हारा जाना, जैसे,

फूलों से, ख़ुशबू छिन जाना।


बेमौसम पतझड़ हो जाना,

दरिया में सूखा पड़ जाना,

तुम्हारा जाना, जैसे,

बारिश में, प्यासा रह जाना।


पलकों से आंसू बह जाना,

नब्ज ज़रा कुछ कम पड़ जाना,

तुम्हारा जाना, जैसे,

दिल की धड़कन, का थम जाना।



- - - - - - - - - - - - - - - - - - -  राजेश मीणा 'बुजेटा'



Thursday, May 20, 2021

त्रासदी

भूखे पेट, नंगे पाँव, 

मैले कुचैले से कपड़े तन पर,

मंज़िल थी कोसो दूर,

चलने की आदत पड़ गई।


खाने को दाना नहीं, और 

करने को कुछ काम नहीं,

ख़फ़ा तो ज़िंदगी पहले से थी, 

पर मौत भी अब रूठ गई।



हम बंजारे, बेघर से दिनभर, 

भटकते रहे यहाँ से वहाँ,

कोई ठौर नहीं रहने की, 

और रात लम्बी हो गई ।


गठरी में सत्तू, सूखी रोटी, 

लिए सफ़र पर चल दिए ।

दिन में तो धूप थी ही मगर, 

अब शाम बोझिल हो गई ।


नाज़ुक सी डोर साँसों की, 

कब चलते चलते छूट गई ?

इंसान तो मरते थे पहले भी, 

पर अब इंसानियत ही मर गई।


- - - - राजेश मीणा बुजेटा

पलायन की पीड़ा

पलायन की पीड़ा हिमालय   की   गोद   में   बसा , देव भूमि - उत्तराखण्ड । दूर से दिखते वो ऊँचे - ऊँचे पहाड़   देवदार की चादर ओढ़े...